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गणगौर पूजा 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त, सम्पूर्ण पूजा विधि व व्रत कथा

Gangaur Pooja 2026: Katha, Time, Pooja Vidhi

Gangaur Pooja 2026: सनातन धर्म में नारी शक्ति और अखंड सौभाग्य के प्रतीक के रूप में कई व्रत-त्योहार मनाए जाते हैं, लेकिन राजस्थान और उत्तर भारत में गणगौर पूजा का महत्व सबसे विशिष्ट है।

यह त्योहार सुहाग और प्रेम का उत्सव है। सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और कुंवारी कन्याएं सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए पूरी श्रद्धा के साथ Gangaur Pooja 2026 की तैयारी कर रही हैं। इस पूजा में भगवान शिव और माता पार्वती की नहीं, बल्कि उनके राजस्थानी स्वरूप ईसर जी और गवरजा माता की पूजा की जाती है।

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आइए जानते हैं गणगौर पूजा 2026 की महत्वपूर्ण तिथियां, पारंपरिक पूजा विधि और प्रामाणिक व्रत कथा।

Gangaur Pooja 2026: महत्वपूर्ण तिथियां (Gangaur 2026 start Date and end Date)

गणगौर का त्योहार मुख्य रूप से होली (धुलंडी) के अगले दिन से शुरू हो जाता है। 16 दिनों तक चलने वाली इस पूजा का समापन चैत्र शुक्ल तृतीया (तीज) को होता है।

  • Gangaur 2026 start Date: गणगौर पूजा का आरंभ 4 मार्च 2026 (बुधवार) को चैत्र कृष्ण प्रतिपदा के दिन से होगा। इसी दिन से महिलाएं दीवार पर 16 बिंदियां लगाना और दूब से अर्घ्य देना शुरू करती हैं।
  • Gangaur 2026 end Date (मुख्य तीज): गणगौर उत्सव का समापन और मुख्य पूजा 21 मार्च 2026 (शनिवार) को होगी। इसी दिन ईसर-गवरजा को भव्य रूप से सजाकर उनकी शाही सवारी निकाली जाती है और विसर्जन होता है।

ईसर-गवरजा की सम्पूर्ण पूजा विधि (Traditional Puja Vidhi)

गणगौर पूजा की विधि बहुत ही विशेष होती है। 16 दिनों तक चलने वाली इस दैनिक पूजा के नियम इस प्रकार हैं:

1. 16 दिनों की दैनिक पूजा का नियम:

  • बिंदियां लगाना: होली के अगले दिन से, महिलाएं सुबह स्नान करके घर की एक साफ दीवार पर 16 रोली (कुमकुम), 16 मेहंदी, और 16 काजल की बिंदियां रोज़ाना लगाती हैं।
  • दूब से अर्घ्य: एक पीतल या चांदी के कलश (लोटे) में शुद्ध जल भरें। उसमें ताज़ी हरी ‘दूब’ (दूर्वा घास) डालें। उसी दूब से उन 16 बिंदियों (माता के स्वरूप) पर जल के छींटे देकर अर्घ्य दिया जाता है।
  • लोकगीत: अर्घ्य देते समय पारंपरिक गीत गाए जाते हैं, जैसे – “गोर ए गणगौर माता, खोल ए किवाड़ी…”
  • भोग और प्रसाद: माता को प्रतिदिन ताज़े फल या मीठे का भोग लगाया जाता है।

2. मुख्य गणगौर तीज (21 मार्च 2026) की पूजा:

  • ईसर-गवरजा की स्थापना: इस दिन लकड़ी या मिट्टी से बने ईसर जी (राजस्थानी साफा और मूंछों में) और गवरजा माता (राजपूती पोशाक, बोरला और भारी गहनों में) को एक लकड़ी की चौकी पर स्थापित किया जाता है।
  • सुहाग सामग्री: गवरजा माता को सोलह श्रृंगार की वस्तुएं (चूड़ियां, सिंदूर, बिंदी, मेहंदी, आलता) अर्पित की जाती हैं।
  • गुणे का भोग: माता को विशेष रूप से मैदे या बेसन से बने मीठे और नमकीन ‘गुणे’ (पारंपरिक पकवान) का भोग लगाया जाता है।
  • विसर्जन (सवारी): शाम के समय सुहागिन महिलाएं पूरी तरह सज-धज कर ईसर-गवरजा की मूर्तियों को सिर पर रखकर गीत गाते हुए नदी या बावड़ी तक ले जाती हैं। उन्हें मीठा जल पिलाकर ससम्मान विदा किया जाता है।

गणगौर की प्रामाणिक व्रत कथा (Gangaur Vrat Katha)

एक बार भगवान शंकर (ईसर जी) और माता पार्वती (गवरजा) भ्रमण के लिए एक गांव में पहुंचे। जब गांव वालों को पता चला, तो गांव की महिलाएं उनका स्वागत करने दौड़ीं।

सबसे पहले गांव की साधारण और गरीब स्त्रियां जल के कलश और साधारण प्रसाद लेकर पहुंचीं। उन्होंने पूरी श्रद्धा से गवरजा माता की पूजा की। माता उनकी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्होंने जल पीकर उन सभी महिलाओं पर सुहाग रस (अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद) छिड़क दिया।

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कुछ समय बाद, गांव की सेठनियाँ और धनी स्त्रियां चांदी के थालों में छप्पन भोग और सोने-चांदी के आभूषण सजाकर आईं। लेकिन माता गवरजा तो अपना पूरा सुहाग रस पहले ही गरीब स्त्रियों पर छिड़क चुकी थीं।

यह देखकर ईसर जी ने पूछा- “हे गवरजा! तुमने तो अपना सारा सुहाग रस बांट दिया, अब इन धनी स्त्रियों को क्या दोगी?”

गवरजा माता मुस्कुराईं और बोलीं- “स्वामी! मैंने उन्हें रस छिड़क कर वरदान दिया है, लेकिन इनका आशीर्वाद तो मेरे ही स्वरूप में छिपा है। मैं अपने रक्त से इन्हें सुहाग दूंगी।”

यह कहकर माता ने अपनी उंगली चीर ली और उस रक्त की बूंदों को उन धनी स्त्रियों पर छिड़क दिया, जिससे उनका सुहाग अमर हो गया। तभी से यह माना जाता है कि जो स्त्रियां गणगौर के दिन ईसर-गवरजा की निष्ठापूर्वक पूजा करती हैं, माता उन्हें अखंड सौभाग्य का वरदान देती हैं।

|| जय माता गवरजा || जय ईसर जी ||

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