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गणगौर माता की पूजा में भूलकर भी न करें ये 3 गलतियां

गणगौर माता की पूजा में भूलकर भी न करें ये 3 गलतियां - Gangaur Pooja Mistakes to Avoid

सनातन धर्म में ‘गणगौर’ (Gangaur) का पर्व सुहाग, प्रेम और अखंड सौभाग्य का प्रतीक है। विशेषकर राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर भारत में 16 दिनों तक चलने वाले इस व्रत को सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और कुंवारी कन्याएं सुयोग्य वर के लिए रखती हैं।

चूँकि यह व्रत सीधे माता पार्वती (गवरजा) और भगवान शिव (ईसर जी) के पवित्र मिलन का उत्सव है, इसलिए इसके नियम बहुत कड़े और विशिष्ट होते हैं। अगर आप भी इस साल गणगौर पूज रही हैं, तो आपको उन वास्तविक और पारंपरिक नियमों का पता होना चाहिए जिनका पालन हमारी दादी-नानी सदियों से करती आ रही हैं।

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आइए जानते हैं वो 3 सबसे बड़ी Gangaur Pooja Mistakes to Avoid जिन्हें भूलकर भी इस पवित्र पूजा में नहीं करना चाहिए:

1. बिना दूर्वा (दूब घास) और कलश के माता को अर्घ्य देना

गणगौर की 16 दिन की पूजा में ‘दूब’ (दूर्वा घास) का सबसे अधिक महत्व है। पूजा का मुख्य विधान ही यह है कि महिलाएँ एक कलश में ताज़ा जल भरती हैं और उसमें हरी दूब (दूर्वा) डुबोकर माता गवरजा को छींटे देती हैं।

सबसे बड़ी गलती जो अक्सर नई उम्र की लड़कियां या महिलाएं कर बैठती हैं, वह यह है कि वे दूब घास की जगह किसी अन्य पत्ते या फूल से छींटे दे देती हैं या साधारण लोटे से सीधे जल चढ़ा देती हैं। सनातन धर्म और राजस्थानी परंपरा में दूब को अमरता, वृद्धि और ‘अखंड सौभाग्य’ का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। बिना दूब और कलश के गणगौर माता की पूजा और उनके गीत (जैसे- ‘गोर ए गणगौर माता…’) पूरी तरह से अधूरे माने जाते हैं।

2. माता गवरजा और ईसर जी की पूजा में तुलसी का प्रयोग करना

हिन्दू धर्म में भगवान विष्णु की पूजा बिना तुलसी के अधूरी मानी जाती है, लेकिन जब बात भगवान शिव और माता पार्वती की हो, तो नियम बिल्कुल बदल जाते हैं।

शिव पुराण और शास्त्रों के अनुसार, भगवान शिव और माता गौरी (पार्वती) की पूजा में तुलसी का पत्ता चढ़ाना पूरी तरह से वर्जित है। चूँकि गणगौर का पर्व शिव-पार्वती का ही स्वरूप है, इसलिए पूजा की थाली में या जल के लोटे में भूलकर भी तुलसी का प्रयोग न करें। इसकी जगह आप बेलपत्र, दूर्वा (घास) और ताज़े फूलों का इस्तेमाल कर सकती हैं। यह एक ऐसी गलती है जो अक्सर लोग अनजाने में कर बैठते हैं।

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3. बिना ईसर जी (भगवान शिव) के केवल गवरजा की पूजा करना

‘गणगौर’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है: ‘गण’ यानी भगवान शिव (ईसर जी) और ‘गौर’ यानी माता पार्वती (गवरजा)। यह त्योहार इन दोनों के एक साथ होने और उनके सुखी दांपत्य जीवन का जश्न है।

कई बार लोग अनजाने में केवल माता गौरी की मूर्ति स्थापित कर लेते हैं या सिर्फ उनका ही ध्यान करते हैं। यह एक बड़ी गलती है। गणगौर की पूजा कभी भी अकेले माता पार्वती की नहीं होती। ईसर जी और गवरजा माता दोनों की मूर्तियां या चित्र एक साथ रखकर, जोड़े में ही उनकी पूजा करनी चाहिए। तभी यह व्रत पूर्ण माना जाता है और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है।

निष्कर्ष (Conclusion):

गणगौर का व्रत सिर्फ भूखे रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह श्रद्धा, शुद्धता और नियमों के पालन की एक तपस्या है। यदि आप ऊपर बताई गई इन Gangaur Pooja Mistakes to Avoid का ध्यान रखेंगी, तो आपका व्रत पूरी तरह से सफल होगा और ईसर-गवरजा की कृपा आपके पूरे परिवार पर बनी रहेगी।

आप सभी को गणगौर पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ! || जय माता गवरजा, जय ईसर जी ||

(डिस्क्लेमर: यह जानकारी लोक मान्यताओं, धार्मिक ग्रंथों और पुरानी परंपराओं पर आधारित है। इसे किसी भी प्रकार से धार्मिक दावा नहीं माना जाना चाहिए। अपनी व्यक्तिगत परंपराओं और परिवार के बड़े-बुजुर्गों की सलाह को सर्वोपरि रखें।)

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